Vivekanand Ki Atmakatha

Vivekanand Ki Atmakatha by Sankar

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Language Hindi
Contributor(s) Sankar
Binding Paperback
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Product Details
Language Hindi
Publication Date 2011
Publisher Prabhat Prakashan
Contributor(s) Sankar
Binding Paperback
Edition 1
Page Count 376
ISBN 9789350481462


Editorial Reviews
स्वामी विवेकानंद नवजागरण के पुरोधा थे। उनका चमत्कृत कर देनेवाला व्यक्‍तित्व, उनकी वाक‍्‍शैली और उनके ज्ञान ने भारतीय अध्यात्म एवं मानव-दर्शन को नए आयाम दिए। मोक्ष की आकांक्षा से गृह-त्याग करनेवाले विवेकानंद ने व्यक्‍तिगत इच्छाओं को तिलांजलि देकर दीन-दुःखी और दरिद्र-नारायण की सेवा का व्रत ले लिया। उन्होंने पाखंड और आडंबरों का खंडन कर धर्म की सर्वमान्य व्याख्या प्रस्तुत की। इतना ही नहीं, दीन-हीन और गुलाम भारत को विश्‍वगुरु के सिंहासन पर विराजमान किया। ऐसे प्रखर तेजस्वी, आध्यात्मिक शिखर पुरुष की जीवन-गाथा उनकी अपनी जुबानी प्रस्तुत की है प्रसिद्ध बँगला लेखक श्री शंकर ने। अद‍्भुत प्रवाह और संयोजन के कारण यह आत्मकथा पठनीय तो है ही, प्रेरक और अनुकरणीय भी है।

अनुक्रमणिका

प्राकथन-7

1. मेरा बचपन-19

2. श्रीरामकृष्ण से परिचय-26

3. श्रीरामकृष्ण ही मेरे प्रभु-56

4. आदि मठ बरानगर और मेरा परिव्राजक जीवन-77

5. पारिवारिक मामले की विडंबना-85

6. कुछ चिट्ठियाँ, कुछ बातचीत-88

7. परिव्राजक का भारत-दर्शन-99

8. विदेश यात्रा की तैयारी-111

9. दैव आह्वान और विश्व धर्म सभा-113

10. अमेरिका की राह में-116

11. अब अमेरिका की ओर-119

12. शिकागो, 2 अतूबर, 1893-127

13. धर्म महासभा में-133

14. घटनाओं की घनघटा-138

15. संग्राम संवाद-141

16. भारत वापसी-242

17. इस देश में मैं या करना चाहता हूँ-277

18. पश्चिम में दूसरी बार-296

19. फ्रांस-319

20. मैं विश्वास करता हूँ-327

21. विदा वेला की वाणी-334

22. सखा के प्रति-353

परिशिष्ट-355

मंतव्यावली-357

तथ्य सूत्र-358



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